July 28, 2026

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जीके पिपिल की एक गज़ल … खरीदार तो थे हम लुटा बाज़ार होकर रह गए

जीके पिपिल
देहरादून

गज़ल

खरीदार तो थे हम लुटा बाज़ार होकर रह गए
क़ुदरत के सताए हुए थे लाचार होकर रह गए।

बीमारी कोई होती तो शायद इलाज़ भी करते
मसीहा के सताए हुए थे बीमार होकर रह गए।

रिश्ता तो मेरा अब भी है नदी से पानी सरीखा
मग़र साहिल होना था मझधार होकर रह गए।

हम फूल बनकर भी किसी के काम नहीं आए
उम्र बीत चुकी जाती हुई बहार होकर रह गए।

ख़ुशी की दुल्हन का अपने संग सफ़र ना हुआ
पालकियां लिए भटकते क़हार होकर रह गए।

उनकी ज़ायदाद में आज तक हिस्सा ना मिला
हम तो बस वसीयत में हक़दार होकर रह गए।

खंडहर तो आज़ भी हैं बुलंद हमारी हवेली के
भले आज़ कागज़ों में जमींदार होकर रह गए।

दरख़्त होकर भी हमसे जड़ों पर छाया ना हुई
हम धूप की कहानी में क़िरदार होकर रह गए।

सराबोर होना था सराबोर करना था होली पर
ग़म नहीं प्रेम में रंगों की बौछार होकर रह गए।

13/3/2025

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