जीके पिपिल
देहरादून, उत्तराखंड

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गज़ल
हमारी ख़ामोशी को हमारा गुमान ना समझा जाय
हम सब समझते हैं हमको नादान ना समझा जाय
हम जो प्यार का जवाब कभी प्यार से नहीं दे पाते
उसको लाभ भी नहीं तो नुकसान ना समझा जाय
हम वो कबूतर नहीं जो किसी भी छत पर जा बैठें
कुछ दम लेने रुके हैं हमें मेहमान ना समझा जाय
हमारे लिबास पर नहीं जाना वो उतरन है वक्त की
लिबास के झरोखे से हमें सुल्तान ना समझा जाय
हमारे दिल में आपके लिऐ क्या क्या है मत पूछना
सब कुछ बता देंगे उतना आसान ना समझा जाय
हमारा तन हमारी रूह के देवता की मिल्कियत है
उसे किसी का खेलने का सामान ना समझा जाय
गम सुख दुख परेशानी सबकी ज़िंदगी में आती हैं
वे सब धुंध जैसे हैं इन्हें आसमान ना समझा जाय
कुछ दिन की ज़िंदगी है सबसे मिलकर गुजार इसे
हमारे विनम्र निवेदन को फ़रमान ना समझा जाय


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