-राज्य की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पैरवी की। उन्होंने कोर्ट में उत्तराखंड लोक सेवा (महिलाओं के लिए क्षैतिज आरक्षण) अधिनियम 2022 की प्रति पेश की।
उत्तराखंड लोक सेवा आयोग की मुख्य परीक्षा की मेरिट में शामिल करने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं बाहरी राज्य की महिला अभ्यर्थियों को राहत नहीं मिली है। महिला अभ्यर्थियों ने सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार की विशेष अनुग्रह याचिका (एसएलपी) पर सुनवाई के दौरान मुख्य परीक्षा में शामिल होने का अनुरोध किया था। कोर्ट ने एसएलपी का निपटारा करते हुए कि महिला आरक्षण के लिए राज्य सरकार एक्ट बना चुकी है और एक्ट को हाई कोर्ट में पहले ही चुनौती दी गई है।
राज्य सरकार बनाम पवित्रा चौहान व अन्य के मामले में एसएलपी पर न्यायमूर्ति वी. रामसुब्रमण्यम और पंकज मित्तल ने सुनवाई की। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में कहा कि उच्च न्यायालय ने राज्य की महिलाओं को 30 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण पर रोक लगा दी थी।
उत्तराखंड की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पैरवी की। उन्होंने कोर्ट में उत्तराखंड लोक सेवा (महिलाओं के लिए क्षैतिज आरक्षण) अधिनियम 2022 की प्रति पेश की। आदेश में कहा गया कि अधिनियम को राज्यपाल की अनुमति मिल चुकी है। 10 जनवरी को इसका राजपत्रित प्रकाशन हो चुका है। इस अधिनियम को हाई कोर्ट में भी चुनौती दी गई है। कोर्ट ने एसएलपी को यह कहकर खारिज कर दिया कि अब इसमें कुछ भी नहीं बचा है। कोर्ट ने याचिका का निपटारा कर दिया।
हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ एसएलपी दायर करने के साथ ही मुख्यमंत्री पुष्कर धामी ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से राज्य सरकार की ओर से पैरवी करने का अनुरोध किया था। मेहता ने सर्वोच्च अदालत में राज्य का मजबूती से पक्ष रखा।


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