डॉ चेतन आनंद
गाज़ियाबाद

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काले, नीले, पीले दिन
पहले तो होते थे केवल काले, नीले, पीले दिन,
हमने ही तो कर डाले हैं अब सारे ज़हरीले दिन।
माँ देती थी दूध-कटोरी, पिता डांट के सँग टॉफ़ी
बड़े हुए तो दूर हुए सब, मस्ती भरे रसीले दिन।
दिन की ख़ातिर रातें रोतीं आँखों में भर-भर आँसू
लेकिन पत्थर बने हुए हैं, निष्ठुर और हठीले दिन।
कुदरत की गर्दन पर आरे, वृक्ष कटे हैं रोज़ाना,
कोयल-गोरैया सब रूठीं, सिमटे सभी सुरीले दिन।
पंछी क्या रूठे, सूरज भी गुस्सा रोज़ दिखाता है,
उसने तहस-नहस कर डाले, देखो छैल-छबीले दिन।


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