राम-भजन

शाम-सवेरे, ‘राम-भजन‘ कर,
फिर ये ‘शरीर’ मिले न मिले,
गिरिराज की ये शुचि, शीतल मंद
सुगंध ‘समीर’ मिले न मिले।
शाम-सवेरे, ‘राम-भजन’ कर….
ये माटी की, ‘कंचन-काया’,
इस में आन बसे ‘मोह’, ‘माया’,
‘कलिकाल’ कुठार लेकर फिरता
‘कठोर प्रहार’ झिले न झिले।
शाम-सवेरे, ‘राम-भजन’ कर,
फिर ये ‘शरीर’ मिले न मिले।
ये ‘बगिया’ है ‘क्षण-भंगुर’,
बोल रहे हैं इसमें ‘झिंगुर’,
डोल रहे ‘पतझड़’ के साये
‘कली’ कल प्रातः खिले न खिले।
शाम-सवेरे, ‘राम-भजन’ कर,
फिर ये ‘शरीर’ मिले न मिले।
‘माँ-गंगा’ की ‘निर्मल-लहरें’,
चली जा रहीं हैं बिन ठहरे,
‘ब्रह्म-कुंड’ में फिर ‘अमृत’ का
‘पुण्य-पुनीत’ मिले न मिले।
शाम-सवेरे, ‘राम-भजन’ कर,
फिर ये ‘शरीर’ मिले न मिले…..
शाम-सवेरे……..
कवि
सुभाष चंद वर्मा
रक्षा अधिकारी (से.नि.)


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