‘राधा-कृष्ण’ को समर्पित मेरी रचना
‘कृष्ण-विरह’
कृष्ण-विरह में, सुध-बुध खोई
छवि अपनी, बिसराती है राधा
पूछे यशोदा, कहाँ है कान्हा
खुद कान्हा बन जाती है राधा
मुरलीधर का, भेष बनाकर
बांसुरी खूब, बजाती है राधा
कृष्ण-विरह में…..
यमुना-तट पर, मोहन बनकर
नंद की गायें, चराती है राधा
केशव बनकर, बाल, सखी संग
मधुबन में, चली आती है राधा
राधा ही राधा, पुकारे है कान्हा
कान्हा ही कान्हा, पुकारती राधा
कृष्ण-विरह में, सुध-बुध……
छवि अपनी, बिसराती……..
राधा का ‘दिव्य-श्रृंगार’
माथे पे बिंदिया, सजाई जब राधिका ने
लगे जैसे निकला हो, सूरज कटोरी में
चुनरी को सिर से, लगाया जब राधिका ने
लगे जैसे चाँद, निकल आया खोली में
बालों में गजरा, सजाया जब राधिका ने
लगता है बांध लिया, खुशबू को डोरी में
माथे पे बिंदिया……
लगे जैसे निकला….

कवि
सुभाष चंद वर्मा
रक्षा अधिकारी (सेo निo)
विजय पार्क, देहरा दून
29th Jul 2024


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