April 21, 2026

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वरिष्ठ कवि/शाइर जीके पिपिल की गज़ल … जैसे दरिया सामने हो और लब पर प्यास नहीं आती

जीके पिपिल
देहरादून,उत्तराखंड


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गज़ल

जैसे दरिया सामने हो और लब पर प्यास नहीं आती
मौत बिलकुल क़रीब है मेरे फिर भी पास नहीं आती

बड़ा ही हुनरमंद है वो कमाल का कातिल जो ठहरा
मीठी वाणी से चीरता है दिल जो ख़रास नहीं आती

वैसे तो दुनियां सबकुछ है ना मानो तो कुछ भी नहीं
कुछ को भाती है ये दुनियां कुछ को रास नहीं आती

अच्छा या बुरा जो भी था वक्त गुजर तो गया लेकिन
बेहतर था जो मुझे उसकी याद भी काश नहीं आती

दुआ मिलें ना मिलें पर किसी की बद्दुआ मत ले लेना
बद्दुआ के असर से तो मैदान तक में घास नहीं आती।।

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