राहें
अब अंधेरों से परदे, हटा लीजिये
अपनी राहों में दीपक, जला लीजिये
ये नदी, आसमां, सब निशाने पे हैं
इस जमीं को कहर, से बचा लीजिये
अब अंधेरों से परदे…….
इन गुलामी के पिंजरों, को तोड़कर
खुद को ताजी हवा में, खुला छोड़कर
इस चमन को बहारों, से सजा लीजिये
इस चमन को……
इस जमीं को कहर, से बचा लीजिये
याद फूलों को मौसम, की आने लगी
कलियाँ ये देखकर, घबराने लगी
अपने आँगन को पेडों, से सजा लीजिये
अपने आँगन को……..
इस जमीं को कहर, से बचा लीजिये
आसमानों में ऊँची, उड़ानों पे हैं
आशियाने कहाँ, बेजुबानों पे हैं
इन परिंदों को फिर, से बसा लीजिये
इन परिंदों को फिर………
इस जमीं को कहर, से बचा लीजिये
अब अंधेरों से परदे, हटा लीजिये
अपनी राहों में दीपक, जला लीजिये
ये नदी, आसमां सब, निशाने पे हैं
इस जमीं को कहर, से बचा लीजिये
अब अंधेरों से परदे…….
कवि
सुभाष चंद वर्मा
रक्षा अधिकारी (सेवाo निo)
विजय पार्क, देहरादून
(उत्तराखंड)


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