जीके पिपिल
देहरादून

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गज़ल
कभी बस में कभी डिलिवरी बॉय के पीछे जा बैठा
कभी उनके सिर पर कभी कदमों के नीचे जा बैठा
कितना कुछ करना पड़ता है उसको कुर्सी के लिए
कल दरगाह में आज़ मंदिर में आंखें मींचे जा बैठा
जहां बोलना चाहता था वहां बोलने ना दिया गया
तो सरककर मां की गोद में मुट्ठियां भींचे जा बैठा
जहां कहीं भी मिला उसे प्रवचन कुर्सी से रिलेटेड
वहीं चुपके से जाकर अपनी सांसें खींचे जा बैठा
उसने भी आज़ सब कुछ ऐसे छोड़ा है जैसे कभी
सिद्धार्थ भी आत्मज्ञान को वृक्ष के नीचे जा बैठा


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