जीके पिपिल
देहरादून, उत्तराखंड

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गज़ल
मुददत से रिहाई की आस में हूं
अपने बदन की कारावास में हूं
मुसाफ़िर हूं मेरी मंज़िल वही है
क़तरा हूं सागर की तलाश में हूं
जिसे मैं देख या छू नहीं सकता
रहता हमेशा उसी के पास में हूं
दस्त में भटक रहा हूं सदियों से
हिरन हूं कस्तूरी की प्यास में हूं
जन्म दर जन्म बदला है पैरहन
मैं कभी कफ़न के लिबास में हूं
छोड़ना है बस मुझे आवागमन
कैसे छूटे बस इसी संत्रास में हूं
चल दूंगा मैं भी औरों की तरह
मैं कहां इस स्थाई निवास में हूं।


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