सुलोचना परमार उत्तरांचली
देहरादून, उत्तराखंड

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सावन
ये अल्हड़ सी जवानी
व सावन का महीना।
पिया संग मैं झूलूं
तू सुन मेरी बहिना।
हाथों में मेंहदी व
पायल की छम-छम।
नाक में ये नथनी
पहनूं मैं हरदम।
बालों में गजरा जब
लगायें मेरे प्रियतम।
शीशे में खुद को
निहारूं मैं हरदम।
रिमझिम सी बारिश में
जब झूले पे झूलें।
दुनियाँ जहां को
हम दोनों ही भूलें।
आंखों से बातें करें
पिया जब हमारे।
हम मदहोश होते हैं
वो जब भी पुकारें।
ये सावन है यारों
संभल करके रहना।
है धरती गगन का
ये मिलन का महीना।


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